प्राचीन भारत का इतिहास | Prachin Bharat Ka Itihas In Hindi | Part-2

The History of Ancient India 

नमस्‍ते दोस्‍तोें हम अपको इतिहास  में  Prachin bharat ke itihas पार्ट-2के बारे में बताएंगे। ये पोस्‍ट Lucent, General Knowledge से ली गई है। हमने इस पोस्‍ट के माध्‍यम से अपको प्राचीन भारत केे इतिहास के बारेे  में सरल भाषा में समझाने की कोशिश की है, जिसे पढ़कर आपको आसानी से समझ आ जायेगा। 

हमने प्राचीन भारत के इतिहास के पार्ट-2 में आपको महाजनपदों का उदय, जैन धर्म और बौद्ध धर्म के बारे में विस्‍तार से व सरल भाषा में इस पोस्‍ट के माध्‍यम से बताया है। हम और भी ऐसी पोस्‍ट आपके लिये अपनी Website पर डालेंगे, जिससे की इस पोस्‍ट से आपका फायदा हो। मेरा आपसे निवेदन है कि मेरे इस पेज को अपने Bookmark में Save कर ले, और समय-समय पर इसे देखते रहे, ताकी जो भी मेरी नई पोस्‍ट आये उसे आप आसानी से देख सकें।

 प्राचीन भारत पार्ट – 2

5. महाजनपदों का उदय

बुद्ध के जन्‍म के पूर्व 6ठी शताब्‍दी ईसा पूर्व में भारतवर्ष 16 जनपदों में बंटा हुआ था। इस बात का पता हमें अगुंत्‍तर निकाय नामक एक बौद्धग्रंथ से मिला।

क्रं.महाजनपदराजधानी(क्षेत्र आधुनिक स्‍थान)
1.अंग  चंपाभागलपुर, मुंगेर (बिहार)
2.मगधगिरिब्रज/राजगृहपटना, गया (बिहार)
3.काशीवाराणसीवाराणसी के आस-पास (उत्‍तर प्रदेश)
4.वत्‍स  कौशाम्‍बीइलाहबाद के आस-पास (उत्‍तर प्रदेश)
5.वज्जि वैशाली/‍विदेह/मिथिला वैशाली मुजफरपुर एवं दरभंगा के आस-पास का क्षेत्र
6.कोंशलश्रावस्‍तीफैजाबाद, गौंडा, बहराइच (उत्‍तर प्रदेश)
7.अवन्तिउज्‍जैन/महिष्‍मतीमालवा (मध्‍यप्रदेश)
8.मल्‍लकुशावंतीदेवरिया, बस्‍ती, गोरखपुर (उत्‍तर प्रदेश)
9.पंचालअहिच्‍छत्र, काम्पिल्‍यबरेली, बदायूं, फर्रूखाबाद (उत्‍तर प्रदेश)
10.चेदिशक्तिमती    बुंदेलखंड (उत्‍तर प्रदेश)
11.कुरू  इन्‍द्रप्रस्‍थआधुनिक दिल्‍ली, मेरठ एवं हरियाण के कुछ क्षेत्र
12.मत्‍स्‍यविराटनगरजयपुर, अलवर, भरतपुर के आस-पास के क्षेत्र (राजस्‍थान)
13.कम्‍बोजहाटकराजोरी एवं हजारा क्षेत्र
14.शूरसेनमथुरामथुरा (उत्‍तर प्रदेश)
15.अश्‍मकपोटली/पोतनगोदावरी नदी क्षेत्र (द. भारत का एक मात्र जनपद)
16.गान्‍धारतक्षशिलारावलपिंडी एवं पेशावर (पाकिस्‍तान)

6. जैन धर्म

जैन धर्म की स्‍थापना करने वाले व पहले तीर्थंकर ऋषभदेव थे। पार्श्‍वनाथ जैन धर्म के 23 वें तीर्थंकर थे। जो अश्‍वसेन काशी के इक्ष्‍वाकु वंशीय राजा के बेटे थे। इन्‍होने 30 वर्ष की उम्र में सन्‍यास जीवन को अपनाया। इन्‍होने कुछ शिक्षाएं दी थी जो इस प्रकार है – 1. हिंसा न करना 2. सदा सत्‍य बोलना 3. चौरी न करना तथा 4. सम्‍पत्ति न रखना।

जैन धमें के 24 वें एवं आखरी तीर्थंकर महावीर स्‍वामी हुए। महावीर स्‍वामी के पिता सिद्धार्थ ‘’ज्ञातृक कुल’’ के प्रधान थे और इनकी माता त्रिशला लिच्‍छवि राजा चेटक की बहन थी। महावीर स्‍वामी का जन्‍म कुण्‍डग्राम (वैशाली) में 540 ईसा पूर्व हुआ था। यशोदा इनकी पत्‍नी का नाम था और अनोज्‍जा प्रियदर्शनी इनकी पुत्री थी। ‘’वर्द्धमान’’ महावीर स्‍वामी के बचपन का नाम था, इन्‍होने 30 वर्ष की अवस्‍था में अपने माता पिता के मृत्‍यु हो जाने के बाद अपने बड़े भाई नंदिवर्धन से इजाजत लेकर सन्‍यास जीवन को अपनाया था।

महावीर स्‍वामी को जृम्भिक के पास ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे 12 साल के कठिन तपस्‍या के पश्‍चात सम्‍पूर्ण ज्ञान प्राप्‍त हुआ। तभी से महावीर जीन, अर्हत व निग्रंथ कहलाए। महावीर के पहले अनुयायी उनके दामाद जामिल थे। महावीर स्‍वामी ने अपने शिष्‍यों को 11 गणधरों में बांट दिया था। आर्यसुधर्मा महावीर की मृत्‍यु के बाद जेनधर्म का प्रथम मुख्‍य उपदेशक बना।

प्रमुख जैन तीर्थंकर और उनके प्रतीक चिन्‍ह

जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे, जिनका प्रतीक चिन्‍ह सांड था।

जैनधर्म के द्वितीय तीर्थंकर अजितनाथ थे, जिनका प्रतीक चिन्‍ह हाथी था।

जैनधर्म के तृतीय तीर्थंकर संभव थे, जिनका प्रतीक चिन्‍ह घोड़ा था।

जैनधर्म के सप्‍तम तीर्थंकर संपार्श्‍व थे, जिनका प्रतीक चिन्‍ह स्‍वास्तिक था।

जैनधर्म के सोलहवें तीर्थंकर शांति थे, जिनका प्रतीक चिन्‍ह हिरण था।

जैनधर्म के अठारहवें तीर्थंकर अरनाथ थे, जिनका प्रतीक चिन्‍ह मीन था।

जैनधर्म के इक्‍कीसवें तीर्थंकर नामि थे, जिनका प्रतीक चिन्‍ह नीलकमल था।

जैनधर्म के बाइसवें तीर्थंकर अरिष्‍टनेमि थे, जिनका प्रतीक चिन्‍ह शंख था।

जैनधर्म के तेइसवें तीर्थंकर पार्श्‍वनाथ थे, जिनका प्रतीक चिन्‍ह सर्प था।

जैनधर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्‍वामी थे, जिनका प्रतीक चिन्‍ह सिंह था।

मगध में 12 वर्षो का अकाल लगभग 300 वर्ष पहले पड़ा था। जिस कारण से भद्रबाहु कर्नाटक अपने शिष्‍यों के साथ चले गये। किन्‍तु मगध में स्‍थूलभद्र के साथ कुछ अनुयायी वही पर रूक गये। भद्रबाहु जब वापस मगध लौटा तो मगध के साधुओं व भद्रबाहु के बिच आसांमजस्‍य पैदा हो गया। तदनुसार जैन मत श्‍वेताम्‍बर एवं दिगम्‍बर नामक दो समुह में बंट गया। स्‍थूलभद्र के शिष्‍य श्‍वेतांबर और भद्रबाहु के शिष्‍य दिगम्‍बर कहलाये।

जैन धर्मं द्वारा तीन रत्‍न अपनाये गये जो त्रिरत्‍न कहे जाते है – 1. सम्‍यक् दर्शन, 2. सम्‍यक् ज्ञान और 3. सम्‍यक् आचरण। इन त्रिरत्‍न में पांच महाव्रतों का पालन अनिवार्य है- अहिंसा, सत्‍य वचन, अस्‍तेय, अपरिग्रह व ब्रहमचर्य।

जैन धर्मं के लोग ईश्‍वर को नही मानते है, वे आत्‍मा की मान्‍यता रखते है। महावीर स्‍वामी पुनर्जन्‍म व कर्म्रवाद पर विश्‍वास करते थे। जैनधर्म को मानने वाले राजा थे- उदयिन, वंदराजा, चन्‍द्रगुप्‍त मोर्य, कलिंग नरेश खारवेल, राष्‍ट्रकुट राजा अमोघवर्ष और चंदेल शासक। चंदेल शासकों द्वारा खजुराहों में जैन मंदिर बनवाया गया था। मथुरा कला का संबन्‍ध जैन धर्म से है। मथुरा मोर्योत्‍तर युग में जैन धर्म का प्रसिद्ध केन्‍द्र था।

7. बौद्ध धर्म

बौद्ध धर्म की स्‍थापना गौतम बुद्ध ने की थी। इन्‍हे एशिया का ज्‍योति पुजं कहा जाता है। गौतम बुद्ध का जन्‍म कपिलवस्‍तु के लुम्बिनी नामक स्‍थान पर करीबन 563 ईसा पूर्व में हुआ था। गोतम बुद्ध के पिता शुद्धोधन शाक्‍य गण के प्रधान थे। इनके जन्‍म के सातवें दिन ही इनकी माता मायादेवी की मृत्‍यु हो गई थी। गौतम बुद्ध की सौतेली मां प्रजापति गौतमी ने इनका लालन-पोषण किया था। सिद्धार्थ, गौतम बुद्ध के बचपन का नाम था। जब गौतम बुद्ध 16 वर्ष के थे तो इनका विवाह कर दिया गया। इनकी पत्‍नी का नाम यशोधरा था व इनका एक पुत्र भी था जिसका नाम राहुल था। गौतम बुद्ध जब अपने राज्‍य में घुमने निकले तो उन्‍होने चार दृश्‍य देखे जो इस प्रकार हे- 1. बूढ़ा व्‍यक्ति, 2. एक बिमार व्‍यक्ति‍, 3. शव एवं 4. एक संन्‍यासी।

संसारिक समस्‍याओं से परेशान होकर सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की उम्र में गृह त्‍याग किया, जिसे बोद्ध धर्म में महाभिनिष्‍कमण कहा गया। गृह त्‍याग करने के बाद सिद्धार्थ ने वैशाली के आलारकलाम से सांख्‍य दर्शन की शिक्षा ग्रहण की। आलारकलाम सिद्धार्थ के प्रथम गुरू हुए। बिना अन्‍न-जल ग्रहण किये 35 वर्ष की आयु में निरंजना नदी के किनारे, वैशाख की पूर्णिमा की रात, पीपल वृक्ष के नीचे 6 वर्ष की कठिन तपस्‍या के बाद सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्‍त हुआ। सिद्धार्थ ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध के नाम से जाने गए। और जहां उन्‍हे ज्ञान प्राप्‍त हुआ वह स्‍थान बोधगया कहलाया। बुद्ध ने अपना पहला प्रवचन सारनाथ में दिया, जिसे धर्मचक्रप्रवर्तन कहा गया। बुद्ध ने अपने प्रवचन पालि भाषा में दिये जो जनसाधारण की भाषा थी। बुद्ध ने सबसे ज्‍यादा प्रवचन कोशल देश की राजधानी श्रावस्‍ती में दिए। बुद्ध के प्रमुख अनुयायी शासक बिम्बिसार, प्रसेनजित व उदयिन थे।

बुद्ध की मृत्‍यु कुशीनारा में 80 वर्ष की उम्र में 483 ईसा पूर्व चुन्‍द द्वारा अर्पित भोजन करने के बाद हो गयी, जिसे बौद्ध धर्म में महापरिनिर्वाण कहा गया। मल्‍लो ने बुद्ध का अन्‍त्‍येष्टि संस्‍कार अत्‍यन्‍त सम्‍मानपूर्वक किया। बौद्ध धर्म अनिश्‍वरवादी है इसमें आत्‍मा का भी कोई वर्णन नही है। बौद्ध धर्म में पुनर्जन्‍म की मान्‍यता है। तृष्‍णा को क्षीण हो जाने की अवस्‍था को ही बुद्ध ने निर्वाण कहा है। ‘’विश्‍व दुखों से भरा है’’ का सिद्धान्‍त बुद्ध ने उपनिषद से लिया।

बुद्ध के अनुयायी दो भागो में बंटे हुए थे, भिक्षुक व उपासक।

भिक्षुक:- बोद्ध धर्म के प्रचार के लिए जिन्‍होने संन्‍यास ग्रहण किया, उन्‍हे ‘भिक्षुक’ कहा गया।

उपासक:- गृहस्‍थ जीवन व्‍यतीत करते हुए बौद्ध धर्म अपनाने वालों को ‘उपासक’ कहा गया।

बौद्ध धर्म में शामिल होने के लिये न्‍युनतम आयु 15 वर्ष थी। बौद्ध धर्म के त्रिरत्‍न है – बुद्ध, धम्‍म एवं संघ। 

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