भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान एवं भारतीय परमाणु अनुसंधान इन हिन्‍दी | Indian Space Research and Indian Nuclear Research In Hindi

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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान एवं भारतीय परमाणु अनुसंधान

Indian Research and Indian Nuclear Research – हेल्‍लो दोस्‍तों आज हम आपको इस पोस्‍ट के माध्‍यम से भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्‍द्र व भारतीय परमाणु अनुसंधान के बारे में बतायेगें। आपको बतायेगें की भारत के अं‍तरिक्ष अनुसधन व परमाणु अनुसंधान में क्‍या-क्‍या होत है यकिन मानिये ये जानकारी आपके लिये बहुत ही फायदेमंद होगी। bhartiya antariksha anusandahn evam bhartiya parmanu anusandhan

अनुक्रम :-

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्‍द्र

प्रमुख अंतरिक्ष केन्‍द्र

प्रमुख भारतीय उपग्रह

उपग्रहो के प्रकार

अंतरिक्ष में प्रथम भारतीय

भारतीय परमाणु अनुसंधान

परमाणु-अनुसंधान एवं विकास के प्रमुख केन्‍द्र

परमाणु परीक्षण

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्‍द्र :-

भारतीय राष्‍ट्रीय अनुसंधान समिति का गठन 1962 में प्रसिद्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई (भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक) की अध्‍यक्षता में किया गया, जिसने परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत कार्य करना प्रारंभ किया।

भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति का पुनर्गठन करके 15 अगस्‍त 1969 को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की (ISRO) की स्‍थापना की गई।

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रमों को सुचारू रूप से संचालित करने के लिये अंतरिक्ष आयोग और अंतरिक्ष विभाग का 1972 में गठन किया गया तथा इसरो को अंतरिक्ष विभाग के नियंत्रण में रखा गया।

वस्‍तुत: भारतीय अंत‍रिक्ष कार्यक्रम की शुरूआत नवम्‍बर, 1963 में तिरूवनंतपुरम स्थित सेंट मेरी मैकडेलेन चर्च के एक कमरे में हुई थी। 21 नवम्‍बर, 1963 को देश का पहला साउंडिग रॉकेट ‘नाइक एपाश’ (अमेरिका निर्मित) को थुम्‍ब भूमध्‍य रेखीय रॉकेट प्रक्षेपण केन्‍द्र (TERLS) से प्रक्षेपित किया गया।

प्रमुख अंतरिक्ष केन्‍द्र :-

1.विक्रम साराभाई केन्‍द्र, तिरूवनंतपुरम (VSSC)
2.इसरो उपग्रह केन्‍द्र, बंगलुरू (ISAC)
3.अंतरिक्ष उपयोग केन्‍द्र, अहमदाबाद (SAC)
4.शार (SHAR) केन्‍द्र, श्रीहरिकोटा
5.द्रव प्रणोदय प्रणाली केन्‍द्र (LPSC)
6.इसरो टेलीमेट्री निगरानी एवं नियंत्रण नेटवर्क   (ISTRAC)
7.मुख्‍य नियंत्रण सुविधा, हासन (MCF)
8.इसरो जड़त्‍व प्रणाली इकाई, निरूवनंतपुरम (IISU)
9.भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला, अहमदाबाद (PRL)
10.राष्‍ट्रीय दूरसंवेदी एजेंसी, हैदराबाद (NRSA)

प्रमुख भारतीय उपग्रह :-

अर्यभट्ट:

स्‍वदेशी तकनीक से निर्मित प्रथम भारतीय उपग्रह अर्यभट्ट को 19 अप्रेल, 1975 को पूर्व सोवियत संघ के बैकानूर अंतरिक्ष केन्‍द्र से इंटर कॉस्‍मोस प्रक्षेपण यान द्वारा पृथ्‍वी के निकट वृत्‍तीय कक्षा में 594 किमी की ऊंचाई पर सफलतापूर्वक स्‍थापित किया गया।

भास्‍कर –I :

प्रायोगिक पृथ्‍वी पर्यवेक्षण उपग्रह ‘भास्‍कर’ –I को 7 जून 1979 को पूर्व सोवियत संघ के प्रक्षेपण केंन्‍द्र बैकानूर से इंटर कॉस्‍मोस प्रक्षेपण यान द्वारा पृथ्‍वी से 524 किमी की ऊंचाई पर पूर्व निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक स्‍थापित किया गया।

भास्‍कर –II :

भास्‍कर –I के संशोधित प्रतिरूप ‘भास्‍कर –II’ को भी रूसी प्रक्षेपण केन्‍द्र, बैकानूर से ही 20 नवम्‍बर, 1981 की पृथ्‍वी से 525 किमी की ऊंचाई पर स्‍थापित किया गया।

रोहिणी श्रृंखला :

रोहिणी उपग्रह श्रृंखला के अंतर्गत भारतीय प्रक्षेपण केन्‍द्र (श्रीहरिकोटा) से भारतीय प्रक्षेपण यान (एस.एल.वी.-3) द्वारा चार उपग्रह प्रक्षेपिता किए गए। इस श्रृंखला के उपग्रहों के प्रक्षेपण का मुख्‍य उददेश्‍य भारत के प्रथम उपग्रह प्रक्षेपण यान एस.एल.वी-3 का परीक्षण करना था। इस अभियान का प्रथम एवं तृतीय प्रायोगिक परीक्षण असफल रहा था। इस अभियान के द्वितीय प्रायोगिक परीक्षण में रोहिणी आरएस- I को 18 जुलाई, 1980 को श्रीहरिकोटा से एस.एल.वी-3 प्रक्षेपण यान से सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। चतुर्थ प्रायोगिक परीक्षण में रोहिणी आर.एस.डी.-2 को 17 अप्रैल, 1983 को श्रीहरिकोटा से एस.एल.वी-3 डी. -2 द्वारा सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया।

प्रायोगिक संचार उपग्रह : एप्‍पल :

एप्‍पल भारत का पहला सिंचार उपग्रह था, जिसे भू-स्‍थैतिक कक्षा में स्‍थापिता किया गया। भारत के प्रथम प्रयोगिक संचार उपग्रह ‘एप्‍पल’ को 19 जून, 1981 को फ्रेंच गुयाना के कोरू अंतरिक्ष प्रक्षेपण केन्‍द्र से यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के एरियन-4 प्रक्षेपण यान द्वारा भू-स्थिर कक्षा में लगभग 36,000 किमी की ऊंचाई पर स्‍थापित किया गया।

विस्‍तारित रोहिणी उपग्रह श्रृंखला (स्‍त्रास-SROSS) :

इस श्रृंखला का उददेश्‍य 100 से 150 किग्रा वर्ग के उपग्रहो का निर्माण करना था, जिन्‍हे संव‍र्द्धित प्रक्षेपण यान (Augmented Satellite Launch Vehicle-ASLV)  द्वारा छोडा गया था। इस श्रृंखला के तहत चार उपग्रह स्‍त्रास-I, स्‍त्रास-II, स्‍त्रास-III एवं स्‍त्रास-IVप्रक्षेपिता किया गया। स्‍त्रास-I एवं स्‍त्रास-II असफल रहा।

भारतीय राष्‍ट्रीय उपग्रह (इनसैट) प्रणाली :

भारतीय राष्‍ट्रीय उपग्रह प्रणाली अर्थात इनसैट प्रणाली एक बहुउददेशीय कार्यरत उपग्रह प्रणाली है, इसका उपायोग लंबी दुरी के घरेलु दुरसंचार, ग्रामीण क्षेत्रों में उपग्रह के माध्‍यम से सामुदायिक दुरदर्शन के सीधे राष्‍ट्रव्‍यापी प्रसारण को बेहतर बनाने आदि वैज्ञानिक अध्‍ययन हेतु भू-सर्वेक्षण तथा आंकड़ो के संप्रेषण में किया जाता है। इनसैट प्रणाली अं‍तरिक्ष विभाग, दूरसंचार विभाग, भारतीय मौसम विभाग, आकाशवाणी तथा दूरदर्शन का संयुक्‍त प्रयास है, जबकि इनसैट अंतरिक्ष कार्यक्रमों की व्‍यवस्‍था निगरानी ओर संचालन का पूर्ण दायित्‍व अं‍तरिक्ष विभाग को सौंपा गया है। इनसैट प्रणाली के प्रथम पीढी में चार उपग्रह (इनसैट-1A,1B,1C,1D)। द्वितीय पीढी में पांच उपग्रह (इनसैट-2A,2B,2C,2D,2E), तृतीय पीढी में भी पांच उपग्रह (इनसैट-3A,3B,3C,3D,3E) तथा चौथी पीढी में सात उपग्रहों के प्रक्षेपण की योजना बनायी गयी है। चौथी पीढी के उपग्रह 4A,4C,4B तथा 4CR का प्रक्षेपण हो चुका है।

भारतीय दूरसंवेदी उपग्रह प्रणाली :

भारत मे राष्‍ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबंध प्रणाली की सहायता के लिए ‘भारतीय दूरसंवेदी उपग्रह प्रणाली’ (Indian Remote Sensing Satellite-IRS) का विकास किया गया है इसका मुख्‍य उददेश्‍य प्राकृतिक संसाधनों (मृदा, जल, भू-जल, सागर, वन आदि) का सर्वेक्षण और सतत निगरानी करना है।

मैटसेट :

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के तहत भारतीय अं‍तरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 12 सितम्‍बर, 2002 को श्री हरिकोटा (आन्‍ध्रप्रदेश) के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्‍द्र से ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान-सी 4(Polar Satellite Launch Vehicle-PSLV-C4) के माध्‍यम से देश के पहले मौसम संबंधी विशिष्‍ट उपग्रह ‘मैटसैट’ (Metasat) को भूस्‍थैतिक स्‍थानांतरण कक्षा (Geostationary Transfer Orbit-GTO) में सफलतापूर्वक स्‍थापित किया।

एजुसैट :

20 सितम्‍बर, 2004 को सतीश धवन अं‍तरिक्ष केन्‍द्र, श्री हरिकोटा से शिक्षा कार्य के लिए समर्पित दुनिया के पहले उपग्रह ‘एजुसैट’ को सफलतापूर्वक भू-सथैतिक कक्षा में स्‍वदेश निर्मित भू-समस्‍थानिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (GSLV F-01) की सहायता से स्‍थापित किया गया।

हैमसैट :

पीएसएलवी-सी  6 द्वारा कार्टोसेट- के साथ ही संचार उपग्रह ‘हैमसैट’ को एक अतिरिक्‍त उपग्रह के रूप में 5 मई, 2005 को छोडा गया। हैमसैट एक छोटे आकार का उपग्रह है जिसका उददेश्‍य देश व विश्‍व के शौकिया रेडियो (हैम) ऑपरेटरों को उपग्रह आधारित रेडियो सेवा मुफत उपलब्‍ध कराना है। इसकी जीवन अवधि लगभग दो वर्ष है।

उपग्रहो के प्रकार :-

परिक्रमा पथ के मापदंडों के आधार पर उपग्रहों को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।

1. निम्‍न भू-कक्षीय कक्षा :

इस प्रकार के उपग्रह सामान्‍यत: एक अंडाकार कक्षा में सामान्‍यत: 200 से 600 किमी की सीमा मे कार्यरत होते है।

2. सौर-तुल्‍यकालिक उपग्रह :

इस प्रकार के उपग्रह निकट-वृत्तिय ध्रुवीय कक्षा में उत्‍तर से दक्षिण की ओर चलते हुए एक निश्चित उंचाई (500-1000 किमी) पर अपना कार्य करते है।

3. भू-तुल्‍यकालिक उपग्रह :

यह उपग्रह एक वृत्‍ताकार विषुवतीय कक्षा में 36,000 किमी की निश्चित उंचाई पर 24 घंटे में एक बार पृथ्‍वी की परिक्रमा करते है।

4. दीर्घवृत्‍तीय मोलनिया कक्षा :

504 किमी उपभू से लेकर 39834 किमी अपभू की उंचाई पर भ्रमण करने वाले उपग्रह इसी वर्ग में आते है।

अंतरिक्ष में प्रथम भारतीय :-

3 अप्रैल, 1984 को स्‍क्‍वाड्रन लीडर राकेश शर्मा अं‍तरिक्ष में जाने वाले प्रथम भारतीय बने। वे दो अन्‍य सोवियत अंतरिक्ष यात्रियों के साथ सोयुज टी-2 अंतरिक्ष यान में कजाखस्‍तान मे बैंकावूर कोस्‍मोड्रोम से अंतरिक्ष में गए। स्‍क्‍वाड्रन लीडर राकेश शर्मा 11 अप्रैल,1984 को सुरक्षित पृथ्‍वी पर वापस लौट आए।

तत्‍कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने सोवियत अंतरिक्ष केन्‍द्र पर स्‍क्‍वाड्रन लीडर राकेश शर्मा से बातचीत की। उन्‍होने पूछा : अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है?  शर्मा का उत्‍तर था ‘सारे जहां से अच्‍छा’।

अंतरिक्ष मे मानव भेजने वाला भारत 14 वां राष्‍ट्र बना और स्‍क्‍वाड्रन लीडर राकेश शर्मा अं‍तरिक्ष में जाने वाले 139वें अंतरिक्ष यात्री।

अंतरिक्ष में जाने वाले भारतीय मूल की प्रथम महिला कल्‍पना चावला थी। इनकी मृत्‍यु 1 फरवरी, 2003 को अंतरिक्ष यान कोलम्बिया के मिशन एसटीएस-107 के वातावरण मे पुन: प्रवेश के कुछ देर पश्‍चात नष्‍ट हो जाने से हो गयी।

भारतीय परमाणु अनुसंधान :-

डॉ. होमी जे. भाभा की अध्‍यक्षता में 10 अगस्‍त, 1948 को परमाणु ऊर्जा आयोग की स्‍थापना के साथ ही परमाणु ऊर्जा अनुसंधान की भारतीय यात्रा आरंभ हुई।

भारत के प्रधानमंत्री की अध्‍यक्षता में परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों के कार्यान्‍वयन हेतु अगस्‍त, 1954 में परमाणु ऊर्जा विभाग की स्‍थापना की गयी। परमाणु ऊर्जा विभाग प्रधानमंत्री के तत्‍वावधान में किए जाते है। परमाणविक ऊर्जा विभाग प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रशासन के अधीन है।

परमाणु-अनुसंधान एवं विकास के प्रमुख केन्‍द्र :-

1. भाभा परमाणु अनुसंधान केन्‍द्र

2. इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केन्‍द्र

3. उच्‍च प्रोद्योगिकी केन्‍द्र

4. परिवर्तनीय ऊर्जा साइक्‍लोट्रॉन केन्‍द्र

परमाणु परीक्षण :-

18 मई, 1974 में पोखरण (जैसलमेर-राजस्‍थान) में भारत ने स्‍वदेशी पहला परीक्षणीय परमाणु विस्‍फोट किया। यह बम 12 किलो टन क्षमता का था।

पहले परीक्षण के 24 वर्षो के बाद पोखरण में दूसरी बार 11 मई व 13 मई, 1998 को परमाणु परीक्षण किया गया, जिसे शक्ति-98 नाम दिया गया।

सब किलो टन (अर्थात 1 किलो टन से कम) विस्‍फोटों का सबसे बडा लाभ यह है कि यदि भारत ने समग्र परमाणु परीक्षण निषेध संधि (सी.टी.बी.टी.) पर हस्‍ताक्षर कर भी दिए, तो इस विस्‍फोटक तकनीके के माध्‍यम के बाद प्रयोगशाला में भी परीक्षणों को जारी रखा जा सकता है।

’शक्ति-98’ योजना की सफलता का श्रेय तीन वैज्ञानिकों को संयुक्‍त रूप से जाता है : 1. आर चिदम्‍बरम 2. ए.पी.जे. अब्‍दुल कलाम 3. अनिल काकोदकर।

1974 के परमाणु परीक्षण में मात्र प्‍लूटोनिक ईंधन का उपयोग हुआ था, जबकि 1998 में परिशोषित यूरेनियम से लेकर ट्रीटियम, डयूटेरियम तक का उपयोग किया गया।

ट्रीटियम ईंधन परमाणु ऊर्जा रिएक्‍टरों में प्रयोग में लाए जाने वाले भारी जल से प्राप्‍त किया जाता है।

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