Famous people associated with Indian culture | भारतीय संस्‍कृति से जुड़े प्रसिद्ध व्‍यक्ति

आज हम इस पोस्‍ट के माध्‍यम से प्राचीन काल में प्रसिद्ध व्‍यक्तियों के बारे में बतायेगें, जो भारतीय प्राचीन काल में एक प्रसिद्ध व्‍यक्तियों के रूप में जाने जातेे है। क़ुुछ ऐसे व्‍यक्ति जिन्‍होने अपने जीवन काल मे इतिहास बनाया है जो आज तक भारतीय लोगो के दिलों में जिवित है। ऐसे महान व्‍यक्तियों के बारे मे हम अपको इस पोस्‍ट में बतायेगें। Bhartiya Sanshkriti se jude prasidh vyakti

भारत के प्रसिद्ध व्‍यक्तित्‍व

Bhartiya kala evam sanskrati– जैसा कि भारतीय नागरिकों द्वारा की जाने वाली सांस्‍कृतिक गतिविधियों की कोई कमी नही है, अत: यह बहुत ही स्‍वभाविक है कि ऐसे कई व्‍यक्ति रहे है जो भारतीय सांस्‍कृतिक एवं परंपरा के अग्रणी रहेे है। यद्यपि उनमे से अधिकांश को प्रासंगिक अध्‍यायों में समझाया गया है तथा प्राचीन और मध्‍यकाल के कुछ प्रमुख व्‍यक्तित्‍व नीचे वर्णित है। भारतीय कला एवं संस्‍कृति‍

चाणक्‍य – सम्राट निर्माता

चाणक्‍य प्राचीन भारत के सबसे ज्‍यादा याद किये जाने वाले व्‍यक्तियों में से एक है। चाणक्‍य माेर्य साम्राज्‍य में शिक्षक, दार्शनिक, अर्थशास्‍त्री, न्‍यायविद और राज्‍य सलाहकार थे। वे कौटिल्‍य या विष्‍णुगुप्‍त के रूप में जाने जाते है। उनके दो ग्रंथ ‘अर्थशास्‍त्र’ और ‘चाणक्‍य नीति’ व्‍यापक रूप से प्रसिद्ध है। चन्‍द्रगुप्‍त मोर्य चाणक्‍य के मार्गदर्शन में महान सम्राट और राष्‍ट्र निर्माता साबित हुए। वे आगे चल कर चन्‍द्रगुप्‍त मोर्य के पुत्र बिन्‍दुसार के मुख्‍य सलाहकार बने।

अशोक-बौद्ध वास्‍तुकला का एक प्रतीक

अशौक मोर्य साम्राज्‍य के महानतम शासकों और प्राचीन इतिहास के सबसे शक्तिशाली शासकोंं में से एक थे। उनका शासन 273 ईसा पूर्व से 232 ईसा पूर्व तक विद्यमान था और इसे भारत के इतिहास में सबसे समृद्ध काल मे से एक माना जाता है। अशौक का जन्‍म मौर्य राजा बिन्‍दुसार और देवी धर्मा के घर हुआ था। वे चंद्रगुप्‍त मोर्य के पौत्र थे।

अशोक आरंभ मे एक क्रूर व निर्मम राजा थे। 256 ईसा पूर्व में उन्‍होने कलिंग में युद्ध में विजय प्राप्‍त की और अत्‍यधिक रक्‍तपात देखने के बाद उनका हदय परिवर्तन हो गया। उन्‍होने लगभग 260 ईसा पूर्व में बाैद्ध धर्म को राज्‍य धर्म भी घोषित किया। अशोक ने इस धर्म का प्रचार करना अरम्‍भ कर दिया और उन्‍होने 14 राजाज्ञाओं के माध्‍यम से अपना दर्शन लिखा जो सम्‍पूर्ण साम्राज्‍य में फैला।

अशोक का निधन 232 ईसा पूर्व में में हुआ। सारनाथ में पाए गए अशोक स्‍तंभ में चार सिंह युक्‍त अशोक चिन्‍ह है, जिसे स्‍वतंत्रता के बाद भारतीय गणतंत्र के राष्‍ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया।

समुद्रगुप्‍त-संस्‍कृति पुरूष

समुद्रगुप्‍त गुप्‍त साम्राज्‍य के चौथे शासक और चंद्रगुप्‍त प्रथम और कुमारदेवी के पुुत्र थे। उनका शासन 335 से 380 ईसवी तक विद्यमान रहा। उन्‍होने कई राज्‍ये पर विजय हासिल की और अपने राज्‍य का विस्‍तार किया। उन्‍होने कई युद्ध लडे और ‘अश्‍वमेध यज्ञ’ सम्‍पन्‍न किया। समुद्रगुप्‍त को ‘संस्‍कृति पुरूष’ भी कहा जाता है। कई सिक्‍कों पर उन्‍हे भारतीय संगीत वाद्य यंत्र वीणा बजाते हुए दिखाया गया है।

समुद्रगुप्‍त को कवियों के राजा की भी उपाधि दी गई थी। समुद्रगुप्‍त की स्‍तुति में, उनके दरबारी कव‍‍ि हरिसेन ने एक पुराने अशोक स्‍तंभ पर शिलालेख अंकित किए जिसमें राजा द्वारा प्राप्‍त की गई विजयाें का विवरण दिया गया है, एव जिसे इलाहाबाद स्‍तंभ शिलालेख के रूप में जाना जाता है।

कालिदास-प्रेम प्रसंगयुक्‍त नाटकों के प्रमुख रचयिता

महाकवि कालिदास पांचवी शताब्‍दी ईसवी के महान भरतीय कवि है। वह विश्व के महानतम संस्कृत कवियों में से एक है। वह गुप्त काल से संबंध रखते थे। उनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ था और वह अपने प्रारंभिक आयु में निरक्षर और अज्ञानी थे। कुछ युक्तियों द्वारा एक राजकुमारी से उनका विवाह कर दिया गया। विवाह के बाद पता चला कि वह निपट मूर्ख है और बुद्धि की खोज में उन्होंने घर छोड़ दिया। भगवान की कृपा से वह विद्वान और कवि बन गए। उन्होंने तीन नाटक अर्थात मालविकाग्निमित्र, अभिज्ञानशाकुंतलम् और विक्रमोर्वशीयम लिखे थे। यह तीनों नाटक इतने प्रसिद्ध हो गए कि इन्होंने कालिदास को प्रसिद्ध कवियों में से एक बना दिया।

शशांक-हिन्दू धर्म का एक महान संरक्षक

शशांक प्राचीन बंगाल के पहले राजा थे उनका शासन गौड साम्राज्य के अंतर्गत 600 से 625 ईसवी तक माना जाता है। शशांक हर्षवर्धन और कामरूप के भास्करवर्मन के समकालीन हैं। शशांक ने सोने और चांदी के सिक्के जारी किए। शशांक ने हिंदू धर्म का पालन किया और वे बौद्ध धर्म के बड़े दमनकर्ता थे। माना जाता है कि शशांक ने बंगाल में बौद्ध स्तूपों को नष्ट कर दिया था। शशांक वह प्रसिद्ध बोधि वृक्ष काटने के लिए भी प्रतिष्ठित है जहां बोध गया में बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। बाद में उसी स्थान पर एक नया वृक्ष लगाया गया था।

हर्षवर्धन-महायान बौद्ध धर्म के महान संरक्षक

हर्षवर्धन उत्तर भारत में 606 से 647 ईसवी तक शासन करने वाले भारतीय सम्राट थे। वह 16 वर्ष की आयु में राजा बने और शत्रुओं को पराजित किया एवं अपनी बहन राज्यश्री को बचाया। उनका साम्राज्य विशाल क्षेत्र तक विस्तारित था। हर्षवर्धन अधिकारियों को भूमि उपहार में दिया करते थे। उनके शासनकाल के दौरान सामंती व्यवस्था को भी बढ़ावा दिया गया था। जिन अधिकारियों को भूमि दी जाती थी वह सामंतों के रूप में जाने जाते थे और राजा को करों का भुगतान करते थे। इससे राजा की शक्ति और प्रत्यक्ष नियंत्रण में कमी आई।

प्रारंभ में हर्ष, शिव और सूर्य के उपासक थे लेकिन बाद में वह महायान बौद्ध बन गए और उन्होंने अपने देश में जानवरों तक की हत्या पर भी प्रतिबंध लगा दी। महायान बौद्ध धर्म पर चर्चा के लिए दो बड़ी बैठक आयोजित की गई थी अंत में उन्होंने अपनी सारी सांसारिक संपत्ति और यहां तक कि अपने वस्त्रों को भी दान कर दिया था।

धर्मपाल-बौद्ध शिक्षाओं के संरक्षक

धर्मपाल बंगाली के पाल वंश का द्वितीय शासक थे। वह पाल राजवंश के संस्थापक गोपाल के पुत्र थे। धर्मपाल के शासनकाल के संबंध में अंतर्विरोध है। कुछ इतिहासकार इसे 770 से 810 ईसवी कहते हैं, जबकि अन्य 783 से 820 ईसवी बताते हैं। वह बौद्ध धर्म का महान अनुयाई थे। उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित किया और विक्रमशीला विश्वविद्यालय की स्थापना की जो बौद्ध धर्म का महान शिक्षण केंद्र बना।

उन्होंने सोमापूरी एवं पहाड़पुर में विहार का निर्माण कराया। तारा नाथ ने उन्हें 50 धार्मिक संस्थाओं की स्थापना और बौद्ध धर्म लेखक हरीभद्र को संरक्षण प्रदान करने का श्रेय दिया था। उन्हें ओदंतपुरी में एक मटके निर्माण का श्रेय भी दिया जाता है।

गोरखनाथ

गोरखनाथ शैव संप्रदाय से संबंधित नाथ योगी थे और मत्स्येंद्रनाथ के 2 सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषयों में से एक थे, दूसरे शिष्य चौरंगी थे। वह आरंभिक ग्यारहवीं शताब्दी के माने जाते हैं। उनके अनुयायी अधिकांश भारतीय हिमालय मैदानों के साथ-साथ नेपाल में पाए जाते हैं। इन अनुयायियों को योगी, गोरखनाथी, दर्शनी या कनफटा कहा जाता है।

वह हिंदू परंपरा में महायोगी के रूप में जाने जाते हैं। उनके उपदेश अधिकतर सत्य और आध्यात्मिक जीवन के सामान्य लक्ष्य की खोज पर जोर देते हैं। कुछ विद्वानों ने हठ योगी से संबंधित मानते है। उनके अनुयायियों को युद्ध कला में भी दक्षता प्राप्त थी। गोरखनाथ मठ नाथपंथी समुदाय का मठ है जिसका नाम नाथ संप्रदाय के नाम पर पड़ा है।

अमीर खुसरो-शास्त्रीय संगीत के प्रतीक

अमीर खुसरो (1253-1325) दक्षिण एशियाई सूफी संगीतकार कवि और विद्वान थे। वह दिल्ली की निजामुद्दीन औलिया के आध्यात्मिक शिष्य थे। खुसरो को कभी कभार भारत का तोता कहां जाता है। उनके गीत देश भर की कई दरगाह में गाए जाते हैं। खुसरो को ‘कव्वाली के जनक’ के रूप में भी माना जाता है।

गजल के विकास में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा। कहा जाता है कि उन्होंने सितार का आविष्कार किया था। उन्हें भारतीय शास्त्रीय संगीत को फ़ारसी ओर अरबी तत्वों के समावेश से समृद्ध करने का श्रेय भी दिया जाता है। लैला मजनू की प्रसिद्ध प्रेम कहानी उनके द्वारा लिखी गई थी। वे दिल्ली सल्तनत के सात से अधिक शासकों के शाही दरबरों से संबंधित शास्त्रीय कवि थे।

मार्को-पोलो प्रसिद्ध इतालवी यात्री

मार्को पोलो (1254-1324) एक इटली का यात्री था जिसने पाण्ड्य राजवंश के साम्राज्य का दौरा किया। वह अपने दृढ़ संकल्प, लेखन और अपने प्रभाव में अन्य यात्रियों से उत्कृष्ट रहा। एशिया से होकर उसकी यात्रा 24 वर्ष चली। अपनी किताब में उसने एक पाण्ड्य राजा के संबंध में लिखा था कि “इस राजा द्वारा पहने जाने वाले सोने और गहनों का मूल्य शहर के अपहरण धन (फिरौती) से अधिक है”। उसने पाण्ड्य राजा के द्वारा घोड़ों के आयात का विवरण भी प्रदान किया। उसने आगे कहा कि जब राजा मर गया तो, शाही सेवकों ने उनके साथ आत्मदाह कर लिया।

रुद्रमा देवी-एक साहसी महिला सम्राट

रुद्रमादेवी 1263 से अपनी मृत्यु तक काकतीय वंश की सबसे युवा शासक थी। वह भारत में सम्राट के रूप में शासन करने वाले बहुत कम महिलाओं में से एक थी एवं उन्होंने पितृसत्ता का समर्थन किया। साम्राज्य की महिला उत्तराधिकारी होने के कारण उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा तथापि उन्होंने साम्राज्य की अखंडता बनाए रखी। उन्होंने ऐसे कई लोगों को योद्धाओं के रूप में भर्ती करने के लिए चुना जो कूलिंग नहीं थे और उनके समर्थन के बदले में उन्हें भूमि कर राजस्व का अधिकार प्रदान किए।

मुहम्मद बिन तुगलक

उलूग खान ने स्वयं को मोहम्मद बिन तुगलक की उपाधि दी। उनका शासन 1324 से 1351 तक विद्यमान रहा। सिहासनारूढ़ होने के बाद उन्होंने कई प्रांतों पर विजय प्राप्त की। उन्होंने दक्कन में देवगिरी में एक नए शहर का निर्माण किया और उन्होंने दौलताबाद का नाम दिया और उसे दक्षिण को नियंत्रित करने के लिए राजधानी बनाने के संबंध में विचार किया। उसे दिल्ली से सभी को इस नई घोषित राजधानी में स्थानांतरित होने के लिए कहा। दिल्ली से स्थानांतरित होना सबके लिए कठिन सिद्ध हुआ और अंत में बादशाह का विचार विफल रहा।

दूसरे राज्य में सोने और चांदी के सिक्कों की कमी थी, तो उन्होंने ‘टोकन पैसा’ अर्थात चांदी के टंके के मूल्य का पीतल एवं तांबे के सिक्के चलायें। तब सभी ने अपने सिक्के बनाने आरंभ कर दिए और जालसाजी आरंभ हो गई, तो यह योजना भी विफल रही। वह शत्रुओं के प्रति अत्यंत कठोर थे। हालांकि वे कविता, खगोल विज्ञान, धर्म और दर्शन में भली-भांति निपुण थे। वर्ष 1351 में उनका निधन हो गया। इब्नबतूता उनके शासनकाल में दरबार में आया था और उसने उनके बारे में लिखा था।

नरसी मेहता

नरसी मेहता एक गुजरात के संत कवि थे जोकि वैष्णव काव्य के क्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त कर चुके थे। इनका कॉल वर्ष 1414 से 1481 ईस्वी था। इन्हें गुजराती साहित्य में महारत प्राप्त थी और इन्हें आदि कवि का दर्जा दिया गया था। उनका भजन “वैष्णव जन तो तेने कहिए जे” महात्मा गांधी का प्रिय था। उनका जन्म एक निर्धन परिवार में हुआ था और वह भगवान श्री कृष्ण के महान भक्त थे। 8 वर्ष की आयु तक वह बोल नहीं पाते थे उन्होंने छोटी आयु में अपने माता पिता को खो दिया और उनका पालन पोषण उनकी दादी ने किया था। वह अपने महान साहित्यकारों के लिए प्रसिद्ध है। उन्हें पद भर से आख्यान और प्रभातिया कहा जाता है।

महमूद बेगड़ा

महमूद बेगड़ा गुजरात के सबसे प्रसिद्ध सुल्तान (1458-1511) थे। अहमदाबाद और चंपानेर उन की दो राजधानियां थी। उन्होंने 50 वर्ष से अधिक अवधि तक शासन किया और गुजरात को समृद्ध बनाया। उनकी दाढ़ी उनके कमर के नीचे तक आती थी। उनकी मुझे इतनी लंबी थी कि वह उन्हें अपने सिर के चारों और बांध देते थे। बताया जाता है कि उन्हें अपने बचपन में विष खिलाया गया था। इसी कारण यदि कोई मक्खी उनके हाथ पर बैठती तो तुरंत मर जाती थी।

उनकी खुराक बहुत अधिक थी। वह अपने नाश्ते में एक कप शहद, एक कप मक्खन और 150 केले खाते थे, रात में भूख लगने पर खाने के लिए मांस समोसे उनके तकिए के निकट रखे जाते थे। इसके अतिरिक्त उनके धार्मिक विचारों, न्यायप्रियता, वीरता और बुद्धिमत्तापूर्ण उपाय ने उन्हें अच्छे गुजराती राजाओं में से एक के रूप में प्रतिष्ठित किया। महमूद ने फलदार वृक्षों के संवर्धन पर भी अत्यधिक ध्यान दिया।

एकनाथ

एकनाथ, ज्ञानदेव द्वारा स्थापित वारकरी संप्रदाय के महान मराठी संत, विद्वान और धार्मिक कवि थे। उनका जन्म 1533 ईस्वी में हुआ था और उन्होंने छोटी आयु में अपने माता पिता को खो दिया था। उनका पालन पोषण उनके दादाजी ने किया था। एकनाथ के परदादा श्री भानुदास (1448-1513) पंढारपुर में विट्ठल संप्रदाय के प्रसिद्ध व्यक्ति थे।

एकनाथ को उनके गुरु जनार्दन ने दीक्षा प्रदान की थी, जो दत्तात्रेय के भक्त थे। उनका प्रमुख ग्रंथ एकनाथ भागवत था, यह भागवत पुराण के 11वें स्कंद पर मराठी टिप्पणी थी। एकनाथ ने कीर्तन एवं भगवान के नाम के जप एवं उपासना के उत्थान पर बल दिया। उन्होंने भक्ति मार्ग के नौ पारंपरिक अंगों की सुरुचिपूर्ण व्याख्या की।

अकबर

अकबर तीसरे मुगल सम्राट थे और उनका पूरा नाम अब्दुल फतह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर था। वह हुमायूं के पुत्र थे और 13 वर्ष की छोटी आयु में राजा बन गए। हालांकि वह मुस्लिम बादशाह थे लेकिन धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखते थे। अपने साम्राज्य में शांति एकता और सहिष्णुता का विस्तार करने के लिए उन्होंने ‘दीन ए इलाही, नामक धार्मिक मार्ग प्रशस्त किया। इस धार्मिक मार्ग का कोई पवित्र पुस्तक या मंदिर नहीं था अपितु केवल एक ही ईश्वर में विश्वास, जानवरों से हिंसा न करना आदि इसके सिद्धांत थे।

अकबर ने अपने दरबार में नवरत्नों या नो जवाहरातों को स्थान दिया था। उनमें अबुल फजल, फैजी, तानसेन, बीरबल, राजा टोडरमल, राजा मानसिंह, अब्दुल रहीम खान-ए-खाना, फकीरा अजियो-दीन और मुल्ला दो प्याजा सम्मिलित थे। अकबर पर लिखी गई किताब अकबरनामा अबुल फजल द्वारा फ़ारसी में लिखी गई थी। यह जीवनी है और इसमें अकबर के जीवन काल का विस्तृत वर्णन सम्मिलित है।

अहिल्याबाई होल्कर

अहिल्याबाई होल्कर (1725-1795) एक महान शासक और मालवा राज्य की महारानी थी। उन्हें लोकप्रिय रूप से राजमाता अहिल्यादेवी होल्कर के नाम से माना जाता था। 1725 में महाराष्ट्र के चोंदी गांव में उनका जन्म हुआ था। वह शिक्षित थी और उन्होंने बहुत पवित्र जीवन जीया। उन्होंने खंड राव से विवाह किया और होलकरों के मराठा समुदाय की वधु बन गई 1754 में कुंभेर के युद्ध में अपने पति की मृत्यु के बाद, उन्हें उनके ससुर मल्हार राव होलकर द्वारा प्रशासन और सैन्य शक्तियों की बागडोर सौंपी गई।

अपने ससुर की मृत्यु के बाद रानी अहिल्याबाई 1766 में मालवा की शासक बनी। बहादुर योद्धा और कुशल धनुर्धर के रूप में उन्होंने कई युद्ध लड़े और भील और गोंडो से अपने राज्य की रक्षा की। उन्होंने अपनी राजधानी को महेश्वर स्थानांतरित कर दिया। 18वीं शताब्दी में नर्मदा नदी के तट पर अहिल्या किले का निर्माण किया गया।

उनकी राजधानी वस्त्र व्यवसाय के लिए प्रसिद्घ हो गई। वह हिंदू मंदिरों के निर्माण और पुनरुद्धार के लिए प्रसिद्ध है। उन्होंने कई किलो, विश्राम ग्रहों, कुँओं और सड़कों के निर्माण, त्योहारों को मनाने एवं हिंदू मंदिरों को दान देने में सरकारी धन का बुद्धिमत्तापूर्वक व्यय किया। उनके प्रयासों ने इंदौर, जो पहले एक गांव था, उसे समृद्ध और सुस्थापित शहर में रूपांतरित कर दिया।

रामकृष्ण परमहंस

रामकृष्ण परमहंस 19वीं शताब्दी के दौरान पैदा हुए एक भारतीय योगी थे। रामकृष्ण (1836-1886) अल्प आयु में ही आध्यात्मिक आनंद प्राप्ति की दिशा में प्रवत्त हो गए। वह देवी काली के प्रति भक्ति, तंत्र, वैष्णव भक्ति, और अद्वैत वेदांत इत्यादि अनेक धार्मिक परंपराओं से प्रभावित थे। वह दक्षिणेश्वर काली मंदिर के मुख्य संरक्षक बने। बंगाली संभ्रांत वर्ग के बीच उनके लिए श्रद्धा और आदर के परिणामस्वरुप उनके प्रमुख शिष्य स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन का निर्माण किया।

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